आंगनवाड़ियों से आगे बढ़ी वात्सल्य की डोर: ‘मोटी आई’ के हाथों में अब मासूमों की सेहत की कमान
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**सिंघम न्यूज़, झाबुआ।**
जब व्यवस्था में केवल औपचारिक आंकड़े दर्ज करने के बजाय आत्मीयता और सामाजिकता का समावेश होता है, तो बदलाव की बयार केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहती बल्कि जमीन पर दिखाई देने लगती है। झाबुआ जिले में कुपोषण के खिलाफ शुरू हुआ अभियान इसी सोच का परिणाम है। कलेक्टर डॉ. योगेश तुकाराम भरसट के मार्गदर्शन में अगस्त माह के प्रथम सप्ताह से शुरू होने जा रहा मोटी आई 2.0” अभियान इस दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होने वाला है। जून माह में ‘पोषण ट्रैकर ऐप’ के जरिए जिले की छह अलग-अलग परियोजनाओं से चिन्हित किए गए 636 गंभीर कुपोषित बच्चों के जीवन में यह पहल सुपोषण का नया सवेरा लेकर आ रही है।
इस पूरे अभियान का सबसे सशक्त पहलू इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक जुड़ाव है। मध्य प्रदेश शासन की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती निर्मला भुरिया के गृह जिले झाबुआ से ही इस नवाचार के पहले चरण का शंखनाद हुआ था। स्थानीय बोली में ‘मोटी आई’ यानी बड़ी मां का पद बेहद आदरणीय और वात्सल्य से भरा माना जाता है। पहले चरण में जब गांव की ही सक्रिय और संवेदनशील महिलाओं को ‘मोटी आई’ के रूप में जोड़कर कुपोषित बच्चों की सीधी निगरानी सौंपी गई, तो उसके अभूतपूर्व परिणाम देखने को मिले। स्नेहपूर्ण व्यवहार, समय पर मालिश, अपनी मौजूदगी में पौष्टिक खान-पान और परिवारों को दिए गए सहज परामर्श ने बच्चों के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार लाया। इसी प्रयोग की सफलता से उत्साहित होकर अब इसका दूसरा संस्करण यानी “मोटी आई 2.0” आकार ले रहा है।

अभियान की इस नई कड़ी को केवल एक विभाग की जिम्मेदारी न बनाकर त्रि-विभागीय समन्वय का रूप दिया गया है। महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग और आयुष विभाग मिलकर इस महाअभियान का संचालन कर रहे हैं। जिला कार्यक्रम अधिकारी सुश्री मोनिका बघेल के अनुसार, वर्तमान में उप स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेष स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर सभी 636 बच्चों की गहन चिकित्सकीय जांच की जा रही है। मैदानी अमला बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण के साथ-साथ उनके परिवारों की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि का ब्योरा ‘पोषण प्रगति कार्ड’ में दर्ज कर रहा है, ताकि कुपोषण की जड़ तक पहुंचकर उसका स्थाई इलाज किया जा सके।
इस पूरी योजना को परिणामोन्मुखी और प्रभावी बनाए रखने के लिए जुलाई के अंतिम सप्ताह में चयनित ‘मोटी आई’ और संबंधित आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का एक विशेष संयुक्त प्रशिक्षण सत्र भी आयोजित किया जा रहा है। कुल मिलाकर, जनजातीय अंचल झाबुआ से शुरू हुआ यह मॉडल यह संदेश देता है कि जब प्रशासनिक दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ लोक-संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का संगम होता है, तो कुपोषण जैसे गंभीर संकट को भी मात दी जा सकती है।
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