*पोर्टलों में उलझा शिक्षक; कक्षा में घटता समय*
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*शिक्षकों के हाथ में चाॅक कम, पोर्टल की जिम्मेदारी ज्यादा*
निर्भयसिंह ठाकुर पिटोल। सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार नई व्यवस्थाएं और डिजिटल सिस्टम लागू किए जा रहे हैं। विद्यार्थियों की उपस्थिति से लेकर मध्यान्ह भोजन, परीक्षाए, प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति, नामांकन और विभिन्न योजनाओं की जानकारी ऑनलाइन दर्ज करने की जिम्मेदारी भी शिक्षकों को निभानी पड़ रही है। स्थिति यह है कि कई शिक्षक अलग.अलग विभागीय पोर्टलों और एप पर जानकारी अपडेट करने में अपने शिक्षण समय का बड़ा हिस्सा खर्च कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि शिक्षक कक्षा में पढ़ाए या पोर्टलों पर सरकारी आंकड़े अपडेट करे ?
पालकों व शिक्षकों का कहना है कि एक ओर सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षाए गतिविधि आधारित शिक्षण और बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात कर रही है वहीं दूसरी ओर शिक्षक को लगातार ऐसे कार्यों में लगाया जा रहा है जिनका सीधे तौर पर अध्यापन से संबंध नहीं है। 2 दर्जन से अधिक पोर्टलों पर अलग.अलग प्रकार की जानकारी भरने के साथ विभागीय रिपोर्ट, ऑनलाइन बैठक, सर्वे , प्रशिक्षण और अन्य प्रशासनिक कार्य भी जिम्मेदारी में शामिल हैं।

*कागज कम हुए लेकिन ऑनलाइन काम बढ़ गया*
पालकों में अंतिम सोनी ने बताया कि डिजिटल व्यवस्था आने के बाद उम्मीद थी कि शिक्षकों का काम आसान होगा और कागजी कार्रवाई कम होगी। लेकिन उनके अनुसार कई शिक्षकों का अनुभव है कि कागजों की जगह अब ऑनलाइन एंट्री ने ले ली है। कई बार एक ही जानकारी अलग.अलग पोर्टल पर अलग.अलग तरीके से दर्ज करनी पड़ती है। ऐसे में कक्षाओं में चाॅक चलाने की बजाय कम्प्यूटरों को चलाने में अधिकांश समय बीत जाता है। जिससे बच्चों की पढाई का कार्य प्रभावित हो रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में समस्या और गंभीर हो जाती है जब नेटवर्क की समस्याए सर्वर डाउन होना मोबाइल या तकनीकी संसाधनों की कमी जैसी दिक्कतों के बीच शिक्षक स्कूल समय के बाद भी ऑनलाइन जानकारी पूरी करने में लगे रहते हैं।
*बच्चों को कितना समय मिल रहा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का*
अभिभावकों में यादवेन्द्रसिंह ठाकुर ने बताया कि सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शिक्षक का अधिक समय प्रशासनिक कामों में चला जाएगा तो बच्चों के लिए पाठ की तैयारी, व्यक्तिगत मार्गदर्शन , कमजोर विद्यार्थियों पर अतिरिक्त ध्यान और गतिविधि आधारित शिक्षण के लिए समय कितना बचेगा ?
शिक्षा का वास्तविक मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितने पोर्टल पर जानकारी समय पर अपडेट हुई। असली सवाल यह कि बच्चे ने कितना सीखा उसकी समझ कितनी विकसित हुई और शिक्षक उसे कितना व्यक्तिगत मार्गदर्शन दे पाया।
*शिक्षक को शिक्षक ही रहने दें*
पालकों का मानना है कि सरकार की योजनाओं की निगरानी और आंकड़ों का संकलन जरूरी है लेकिन इसके लिए अलग व्यवस्था विकसित की जा सकती है। शिक्षकों को अपने मूल कार्य से दूर न किया जाऐ। स्कूलों में डेटा एंट्री और प्रशासनिक कार्यों के लिए डाटा ऑपरेटर या क्लेरिकल स्टाफ की व्यवस्था हो तो शिक्षक अपना मूल कार्य बेहतर ढंग से कर सकते हैं।
शिक्षक का सबसे महत्वपूर्ण काम बच्चों को पढ़ाना, उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करना और उनके व्यक्तित्व का निर्माण करना है। यदि शिक्षक का अधिकांश समय सरकारी रिपोर्टिंग में बीतता है तो इसका प्रत्यक्ष असर विद्यालय में अध्यनरत छात्रों के जीवन व रिजल्ट पर पढेगा। सरकार के लिये भी यह विचारणीय प्रश्न होना चाहिये कि शिक्षक से कितने प्रकार की ऑनलाइन रिपोर्टिंग कराई जा रही है और उसका वास्तविक शैक्षणिक परिणाम क्या है। जबकि जरूरत इस बात की है कि विभिन्न पोर्टलों को एकीकृत कर सिगल विंडो सिस्टम बनाया जाए। एक बार जानकारी दर्ज करने के बाद वही आंकड़ा संबंधित सभी विभागों को उपलब्ध हो। इससे शिक्षक को एक ही जानकारी बार.बार दर्ज नहीं करनी पड़ेगी।
*शासन से बड़ा सवाल*
शिक्षिका गिरिजा ठाकुर नें बताया कि आज सरकारी स्कूलों में शिक्षक से प्रशासनिक कर्मचारी, सर्वेयर, डेटा ऑपरेटर और विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयनकर्ता की भूमिका निभाने की अपेक्षा की जा रही है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या हम शिक्षक से इतना गैर.शैक्षणिक काम लेकर उसी से बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की उम्मीद कर सकते हैं?
यदि वास्तव में आने वाली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा देनी है तो शिक्षक को पोर्टलों और कागजी.ऑनलाइन औपचारिकताओं से मुक्त कर कक्षा और बच्चों के बीच अधिक से अधिक समय देने की है। अब जरूरत शिक्षक का काम बढ़ाने की नहीं बल्कि उसका अनावश्यक बोझ घटाने की है। कतिपय शिक्षकों की पीडा यह भी है कि जीवन का अधिकतम समय उन्होने शिक्षण कार्य में दिया है कंप्यूटरों से उनका कोई सरोकार ही नहीं रहा और अब जब उन्हें मजबूरन कम्प्यूटर पर काम करना पड रहा है तो उनके तनाव के तापमान की कोई सीमा नहीं रह जाती। वर्तमान दौर में बढती जिम्मेदारी के बीच शिक्षक के सामने अध्यापन ओर प्रशासनिक कर्यो में संतुलन बनाना चुनोति बन गया है।
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